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अल्लाह हाफिज़………राम भरोसे

एन डी टी वी 24/7 पर पिछले दिनो प्रसारित एक रिपोर्ट में ( http://in.youtube.com/watch?v=EwDlZEtjJhk ) सिमी के (अ)भूतपूर्व प्रेजिडेंट शाहिद बद्र फलाही ने कहा कि बोमियान की मूर्तिया गिराना जायज था क्योकि वहा कोई इबादत नही करता था, उन्होंने अपने बाप दादा का भी उदहारण दे डाला. फलाही से क्या कोई पूछने का कष्ट करेगा कि उसने बाबरी मस्जिद में कितनी बार नमाज़ पढ़ी थी और क्या फलाही का बयान ख़ुद बाबरी मस्जिद को गिराना सही साबित नही करता ? अगर तालिबान का बोमियां कि मूर्तियाँ गिराना सही था तो बाबरी मास्जिद को गिराए जाने पे इतनी हाय तौबा क्यों ? सारा आतंकवाद और जिहाद उसी का तथाकथित बदला लेने के लिए ही तो है ? क्या फर्क है मोदी का विरोध करने वालों और मोदी में ?

जिस तरह से प्रशांत भूषण जैसे कानून के जानकार भी टी आर पी के चक्कर में पड़ गए दिखते हैं, और तुंरत फुरत फैक्ट फाइंडीन्ग़ टीम लेकर बाटला हाउस पहुँच गए प्रशांत जी से कोई पूछे कि कितनी बार वे देश भ्रमण पे निकलें हैं बेगुनाह लोगो को झूठे मुक़दमों से बचाने. देश भर के आंकडों पे भी ध्यान देकर प्रशांत भूषण की फैक्ट फाइंडीन्ग़ टीम अगर काम करे तो शायद देश भर के लोग झूठे मुकदमों में फंसने से बच जायेंगे.

तथाकथित मानवाधिकारवादी ब्लास्ट में मारे गए लोगों और उनके परिवार की चीखें तो नही सुन पाते लेकिन अचानक जैसे ही कोई आतंक का आरोपी पकड़ा जाता है , इनकी सेकुलरिज्म की दुकान का शटर उठ जाता है. जब आतंक और आतंकवादी का कोई मज़हब नही, तो पकडे गए आरोपियों का मज़हब अचानक क्यों सामने आ जाता है? क्या कभी इन मानवाधिकार संगठनों ने आतंक के शिकार लोगों से जाकर यह पूछा है कि उन लोगो को सरकारी वायदों के हिसाब से मुआवजा मिला या नही, परिवार के मुखिया या कमाने वाले की मौत के बाद गुजर बसर कैसे हो रही है ?

राजनेता हों, पुलिस हो, जांच एजेन्सी हो, मीडिया हो और खासतौर पे ये मानवाधिकारवादी सभी के लिए आजमगढ़, आबो हवा बदलने के लिए एक जगह बनकर रह गयी है, गोया कि आजमगढ़ एक चिडियाघर और आजमगढ़ के लोग इस चिडियाघर के बाशिंदे. कहाँ थे ये सभी, ज़ब अंडरवर्ल्ड यहाँ के नौजवानों को बहुत लुभावनी नौकरियां दे रहा था ? काश ! तब इनको आजमगढ़ कि याद आई होती. जामिया नगर क्या अभी तो पता नही इस देश में और कितने कश्मीर बनेंगे?

खैर, जो भी हो आतंक और अलगाव फैलाने वालों का मकसद राजनेताओं , पुलिस, जांच एजेंसियों , मीडिया ने और विशेषतौर पर इन मानवाधिकारवादियों ने पूरा कर दिया है. विडम्बना यह है कि इन्ही पर समाज को बांधे रखने कि ज़िम्मेदारी थी और इन्होने ही आतंक के शिकार समाज का ध्रुवीकरण कर दिया है. एक समाज है, जो आतंकवादियों के मुसलमान होने का जख्म झेल रहा है और एक समाज है जो एक विवादित ढांचे के गिरने का दंश झेल रहा है और कीमत चुका रहा है. दोनों कौमों के अलगावादी सही कहते हैं यह देश राम भरोसे या इस देश का अल्लाह हाफिज़…

 

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पहचान ना मेरी बिरादरी

 

कमरे में आकर टीवी ऑंन किया ही है और खबरिया चैनलों पर कॉमेडी और बिग बॉस की अश्लीलता कि भीड़ में ख़बर तलाशने की कोशिश कर रहा हूँ … यह दिखा…. हिन्दुस्तान के राजनितिक इतिहास का सबसे हिट और सबसे ज्यादा टी.आर.पी. वाला एनकाउंटर…

इस ख़बर और इस एनकाउंटर पे हो रही छिछालेदर देखकर, गाली की एक बौछार मुखारबिन्दु से पान के पीक की तरह निकलने को बेताब थी… लेकिन शायद अपना भी हाल किसी तथाकथित और बेहुदे वीआईपी की सुरक्षा में खड़े सुरक्षा कर्मी की ही तरह था…

आप शायद यह सोच रहे होंगे की मै भी कुछ सांप्रदायिक बात करने वाला हूँ .माफ़ करियेगा, आपकी इन उम्मीदों पर तुषारापात करने के लिए. मुझे तो सहसा ही इस बिरादरी का ध्यान आ गया जो आजकल समाचार में अपने मौलिक कारणों से कम और बाकी अन्य कारणों से ज्यादा छाई नज़र आती है (अगर अभी भी चाणक्य, अरस्तु या जॉन लोके की परिभाषा में फेर बदल नही किया है तो… )

इस बिरादरी के लोग अपने रसूख के हिसाब से अपनी सुरक्षा के लिए ज्यादा से ज्यादा सुरक्षा कर्मी तैनात करवाएंगे, आम जनता, जिसके वोट से ये चुन कर आते हैं , जिसके टैक्स का पैसा इनकी ऐय्याशियों पर खर्च होता है, उसी जनता को ये अपनी सुरक्षा इन्तज़ाम की धौंस दिखाएँगे… समरथ को दोस नही गुसाईं…….

एक और बहुत बड़ी विशेषता है इस बिरादरी की कि यह उन्ही सुरक्षा एजेंसियों को गाली देंगे जिनके जवान इनकी सुरक्षा में तैनात हैं. मजेदार बात यह है कि बेचारे सुरक्षा कर्मी उस वक्त भी इन्हे सुरक्षा घेरे में लिए रहते हैं.

(महान हैं इस बिरादरी के लोग, जो दुनिया भर में मशहूर भारतीय रणबांकुरों को अपनी सुरक्षा में खड़ा कर, अपनी उपस्थिति मात्र से नपुंसक बना देते हैं….)

जिस चालाकी से यह बिरादरी काम करती है, उसका अंदाजा आप आपके शरीर में इनके विष दंत घुस जाने का बाद ही लगा पाएंगे. अब जैसे कि हमारे देश के, सदी के महनायक के छोटे भइया का उदहारण ले लें.

उन्होंने दरियादिली दिखाते हुए दिल्ली पुलिस के एक जज्बाती और मामूली से इंसपेक्टर के मरने पर पूरे दस लाख रूपये उसके परिवार को देने कि घोषणा कर दी, इंसपेक्टर भी जज़्बाती था, इसीलिए बेटे को अस्पताल में छोड़कर तो जान से हाथ धो बैठा और उस से ज्यादा जज़्बाती यह भारत नाम का राष्ट्र, किसी कमबख्त की नज़र ही नही गई कि चेक पर, शब्दों में तो दस लाख लिखा है पर अंकों में सिर्फ़ एक लाख.

(इस देश कि बेवकूफ जनता यह नही समझ पायी कि इस बिरादरी के गिनती में हमेशा से शब्दों और अंकों में फर्क रहा है.)

अचानक, दो हफ्ते बाद ही इस बिरादरी के लोगों को याद आ गया कि चुनाव नज़दीक हैं, दिल्ली पुलिस के ऊपर भी इल्जाम ठोक दिया कि मरने वाले जज्बाती इंस्पेक्टर के लिए, किसी के दिल में कोई चाहत नही थी, उसे तो बलि का बकरा बनाकर अपने लोगों (दिल्ली पुलिस) ने ही मार दिया.

एक हाथ से बैंक का चेक और दूसरे हाथ से वोट बैंक की गिनती, यही बिरादरी कर सकती है…. लगता तो है कि छुटभइया … माफ़ करियेगा ज़बान फिसल गई… छुटके भइया आर्थिक मंदी के दौर में आर्थिक तंगी से गुज़र रहे हैं , तभी तो ऐसा बयान दिया कि चेक भी वापस आ जाए और वोट बैंक भी बरकरार रहे.

हम आप लाख इस बिरादरी के ज़मीर को चुनौती देते रहें कोई फर्क नही पड़ेगा, जी तो चाहता है कि पूछूं, भइया, अब जब सारे आतंकवादी निर्दोष हैं और ऐसी किसी वारदात में सम्मिलित नही हैं, तो आप अपने ऊपर होने वाली सुरक्षा के खर्च का बोझ इस गूंगी-बहरी और कम याददाश्त वाली निरीह जनता पर क्यों डाल रहे हो?

"आपकी सुरक्षा के अलावा भी बहुत काम है सुरक्षा एजेंसियों के पास- कम से कम प्राकृतिक आपदा में आपके हवाई दौरों से ज्यादा ज़मीनी काम यही करते हैं."

इस बिरादरी के लोगों को चुनौती एक ही बिरादरी से मिल रही है, इन्ही के पद चिह्नों पर चलते हुए कुछ समाज सेवियों ने भी अपने सेकुलरिज्म के दूकान के शटर उठा लिये हैं और इन्ही कि तुष्टिकरण वाली भाषा बोल रहे हैं. वैसे इस बिरादरी के लोगों को डरने कि कोई आवश्यकता नही क्योंकि ये समाज सेवी जल्द ही इनमे से एक हो जायेंगे. समाजसेवा के नाम का बलात्कार कर पहले भी तो ऐसे लोग इस बिरादरी में शामिल होते रहे हैं .

धन्य हैं, इस बिरादरी के लोग जो किसी की मौत का भी जगह जगह तमाशा लगा लेते हैं….

अरे.. ये गली में आवाज़ कैसी…….

” ए ज़मूरे…. तमाशा दिखायेगा…. दिखायेगा उस्ताद ….. क्या दिखायेगा….. जादू दिखायेया उस्ताद.. कैसा जादू ….. हम ये खाकी और काली ड्रेस पहने और बन्दूक लिए लोगों को गाली देगा …. और यही बन्दूक लिया लोग हमारा सुरक्षा करेगा… और क्या दिखायेगा ज़मूरे….. दिखायेगा कि बमों के फटने बीच कपडे और बयान कैसे बदलता हैं….”

…… चलो कोई तो है जो अपना वही काम कर रहा है, जिसका वो दावा कर रहा है…

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पलट तेरा ध्यान किधर है… सेकुलरिज्म की दुकान इधर है….

पुण्य प्रसून वाजपेयी जी के ब्लॉग पर लिखे लेख भले ही न प्रेरित करते हों कुछ लिखने को, किंतु वहां लिखी टिप्पणियां आपको ज़रूर उद्वेलित कर देंगी. हर बार किसी न किसी फंतासी लेखक की दुकान इस हाट में खुलती नज़र आ जाती है. इस बार तो एक फंतासी लेखक ने मीडिया क्लिपिंग्स और कांसपिरेसी थेओरी की बाढ़ ही ला दी है. अब सवाल ये उठता है कि जब दिल्ली से प्रकाशित होने वाले अलग अलग अख़बारों ने ही इस मुठभेड़ का समय अलग अलग बताया हो, तो आप इन अख़बारों में लिखे फंतासी लेखकों के लेखों पर कितना भरोसा कर सकते हैं?

ज्यादातर मानवाधिकार सम्मेलनों में जाने वाले इन बुद्धजीवीयों के लिए यह मौका हवा पानी बदलने का होता है, ज़रा पूछे कोई इनसे, मानवाधिकार और सांप्रदायिक सदभाव की बातें यह आम आदमी को सुनाने हवाई जहाज़ या रेल के ए. सी. डब्बों में या ए. सी. टैक्सीयों में जाते हैं, उसका खर्च कौन उठाता है? प्रश्न आपकी मंशा पर नही मानवाधिकारवादियों, प्रश्न आपके द्वारा प्रयोग किए जा रहे साधन और उन साधनों को उपलब्ध कराने वालों पर है? तो क्या ऐसे साधनों का उपभोग करने के पश्चात् आपके द्वारा कही गई बातों का कोई मतलब रह जाता है?

अच्छा लगा जानकर कि पी. यु. सी. एल. और पी. यु. डी. आर. का लंगडा, काना और बहरा साम्प्रादायिक सदभाव , पुण्य प्रसून वाजपेयी जी के ब्लॉग पर भी अपना शो रूम खोलने में सफल हो गया. पहले तो लगा था कि ये सिर्फ़ "बाटला हाउस के इर्द-गिर्द" ही अपनी दुकान चलाएंगे. काश! ये इतनी प्रेस क्लिपिंग्स इस तथ्य की भी एक्त्रतित कर पाते कि कितने बम धमाकों ने इस देश को लहू लुहान किया है?

ए. सी. कमरों में बैठकर कोई भी फैक्ट फाईनडिंग टीम एक अच्छी कांसपिरेसी थेओरी लिख सकती है, वो भी खास तौर से जब अल्प संख्यकों और दलितों का मसीहा बनकर फोरेन फंडिंग लानी हो तो.

मौलिक एलिस इन वंडरलैंड की तरह इन्हे भी फंतासी लिखने में मज़ा आने लगा है, खुदा न खास्ता इन फंतासी लेखकों का कोई अपना मारा जाए इन बम धमाकों में …. क्या ये तब भी बैठकर इस तरह की फंतासी कहानियाँ लिखेंगे और प्रेस क्लिपिंग्स एकत्र करेंगे?

धमाकों में अल्पसंख्यक भी मरे और बहुसंख्यक भी, लेकिन मरहम सिर्फ़ एक समुदाय के ऊपर लगाने की मुहीम क्यों? एनकाउंटर में मरने वाला हर शख्श हिन्दुस्तानी था, एक ने देश के लिए जान दी और दूसरे ने देश से बगावत करके जान दी. बेहतर होता, ये मानवाधिकारवादी, युवाओं को इस राष्ट्र से बगावत करने के लिए उकसाने वाले को बेनकाब करते.

अगर इन तथ्यों को कोई बहुसंख्यक सांप्रदायिक मानसिकता का मानता है, तो कोई परहेज़ नही, कम से कम यहाँ मुखौटा लगाकर लंगडे, काने और बहरे साम्प्रादायिक सदभाव की दुकान तो नही लग रही. जिस दुकान पर सामने तो अपनी खुजली मिटाने के लिए अल्पसंख्यकों के नाम का मरहम बिकता हो और पिछले दरवाज़े से सांप्रदायिक और फासिस्ट ताकतों को ध्रुवीकरण का टानिक दिया जाता हो.

Technorati Profile

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UP: Reservation in Private Sector Boomranged on Mayawati

On 10th of August Ms. Mayawati, Chief Minister of Uttar Pradesh took a hasty Decision. In a In an unprecedented decision taken by her cabinet, all private business enthusiasts seeking special yielding from the government, for setting up new manufacturing or commercial units in the state compulsorily need to reserve 30 percent posts in their companies for three different categories of employees.
Cabinet decided that the quota would be uniformly classified under three categories, between Scheduled Castes, Other Backward Castes, including those belonging to the minority community, and the economically weak among upper castes.
As expected, the very next day, industry associations came out strongly, they out rightly rejected the offer. Some of them even threatened to move out of Uttar Pradesh if this decision was forced upon them.
Few weeks back, Mayawati had met PM Manmohan Singh and urged him to make the private sector reservation mandatory by legislation through a constitutional amendment. In fact she also suggested to including it in the Ninth Schedule to insulate it from legal challenges. After returning from Delhi, she was hastened and without waiting for the Centre’s response and going overboard introduced the policy.
Mayawati played her caste card acceptably in recent UP Assembly elections, it had taken aback the masters of politics. This move by her was an effort to stamp out the digital divide which was created by the implementation of Mandal Commission Report in late eighties.
Supporters of reservation in private sector have been quoting example of developed western countries. However, they forget, governments and policy makers there, give more importance to brilliance, quality, diligence, performance, and talent than religious conviction and social order.

 

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